चंपावत -जहां एक तरफ नई पीढ़ी आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए अपनी संस्कृति एवं रीति रिवाजों को भूलती जा रही है, वहीं आदर्श विहार के लोगों ने युवा पीढ़ी के लिए एक नई मुहिम शुरू की है,यहां के लोग न केवल पारंपरिक तरीके से होली गायन कर रहे हैं बल्कि छोटे छोटे बच्चों और युवाओं को इस परंपरा से जोड़ भी रहे हैं.
फाल्गुन की मादक बयार और अबीर-गुलाल की रंगत के बीच चंपावत शहर के आदर्श विहार कॉलोनी में इस वर्ष भी होली का पर्व पारंपरिक कुमाऊंनी अंदाज में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यहां होली केवल रंगों का उत्सव नहीं रही, बल्कि पहाड़ की लोकसंस्कृति, सामूहिक सौहार्द और सांगीतिक परंपरा का सजीव प्रतीक बनकर सामने आई।
आदर्श विहार की खास पहचान उसकी सामूहिक पहाड़ी होली है, जहां महिलाएं, पुरुष और बच्चे एक साथ ढोल की थाप पर पारंपरिक होली गीत गाते हैं। इसी बीच ढोल ओर मजीरा बजाने के लिए बच्चे प्रयास करते नजर आते है जो बुजुर्ग लोगों के नेतृत्व में रहते हैं।
“वेदांती होली – गई गई असुर तेरी नार मंदोदरी” और “रास रचो रसिया” जैसे पारंपरिक गीतों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिरस और श्रृंगार रस में डूबा रहता है।
लोग एकत्र होकर ढोल की थाप पर खड़ी होली का गायन करते हैं। बुजुर्गों ने जहां पारंपरिक रागों की बारीकियां सिखाईं, वहीं युवाओं ने पूरे मनोयोग से उन्हें आत्मसात किया। 84 वर्षीय नारायण दत्त खर्कवाल की उपस्थिति आयोजन का विशेष आकर्षण रही।
होली गायन में लक्ष्मी दत्त जोशी, भुवन पंगारिया, शेखर कलखुड़िया, मोहन जोशी,रमेश चंद्र जुकरिया, कुंदन सिंह लड़वाल, मोहन चंद्र खर्कवाल, मुकेश वर्मा, पुष्कर दत्त शर्मा, हेमेश कलखुड़िया सहित आदर्श विहार की समस्त महिलाएं और बच्चे शामिल रहे।
आदर्श विहार ने एक बार फिर साबित किया कि जब त्योहार लोक परंपराओं के साथ मनाए जाते हैं, तो वे समाज में प्रेम, एकता और सांस्कृतिक चेतना का संदेश फैलाते हैं।
चंपावत आदर्श विहार कॉलोनी की खड़ी होली युवाओं ओर बच्चों को जोड़ रही पारंपरिक संस्कृति से।
