चंपावत: “उड़ने का हौसला है, पर पंख नहीं” सुदूर सलान गांव की बेटियों का दर्द।

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नौवीं के बाद स्कूल नहीं, सपनों पर लग रहा विराम; बेटियों की उम्मीदें प्रशासन पर टिकीं।


लोहाघाट। सरयू घाटी के सलान गांव की एक बेटी का दर्द आज पूरे सिस्टम से सवाल कर रहा है। आखिर कौन समझेगा उस मन की पीड़ा, जिसमें उड़ने का सपना तो है, लेकिन पंख नहीं। यह बेटी राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक जैसे बड़े पदों तक पहुंचने का सपना देखती है। ईश्वर ने उसे बुद्धि, क्षमता और हौसला सब कुछ दिया है, लेकिन उसके सपनों की राह में सबसे बड़ी बाधा है शिक्षा का अभाव। गांव में नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई के लिए कोई स्कूल ही नहीं है। बेटी चाहती है कि वह अपने माता-पिता का सिर गर्व से ऊंचा करे, अपने गांव और जिले का नाम रोशन करे, देश के लिए कुछ बड़ा करे। लेकिन संसाधनों की कमी उसके सपनों को अधूरा छोड़ने पर मजबूर कर रही है। इस गंभीर स्थिति के बीच राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका मंजू वाला ने इन बेटियों में नई उम्मीद जगाई है। उनके शब्दों ने बालिकाओं के मन में साहस और आत्मविश्वास भरा है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि वह उनके साथ खड़ी हैं।
मंजू वाला ने बेटियों की समस्या को जिलाधिकारी मनीष कुमार तक पहुंचाया है। अब सभी की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं। बेटियां उम्मीद लगाए बैठी हैं कि जल्द ही कोई ठोस कदम उठेगा और उनकी शिक्षा का रास्ता खुलेगा।
यह मामला सिर्फ एक गांव की बेटियों का नहीं, बल्कि उन तमाम पहाड़ी क्षेत्रों की सच्चाई है, जहां आज भी शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं अधूरी हैं। सवाल साफ है जब सपने इतने बड़े हैं, तो क्या व्यवस्था उन्हें उड़ान देने के लिए आगे आएगी? अब देखना यह है कि प्रशासन कब इन बेटियों के सपनों को पंख देता है।


फोटो – सुदूर गांव की एक बेटी शिक्षिका मंजू बाला मेडम से अपना दर्द साजा करते हुए।


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