मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की परिकल्पना के तहत मॉडल जिला बन रहा चंपावत, बायोमास आधारित फिरुल ब्रिकेट परियोजना को मिला राष्ट्रीय सम्मान।

चंपावत। जिले को मॉडल जिला बनाने की दिशा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की परिकल्पना अब धरातल पर साकार होती दिख रही है। पर्यावरण संरक्षण, रोजगार सृजन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में जिले ने एक नई पहचान बनाई है। उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकोस्ट) को नोडल एजेंसी बनाकर भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) के सहयोग से लधियाघाटी के भिगराड़ा गांव में स्थापित फिरुल ब्रिकेट मार्केटिंग यूनिट ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इस ट्रायल यूनिट की सफलता को देखते हुए अब जिले में दो नए स्थानों पर ऐसी ही यूनिट स्थापित करने की तैयारी शुरू कर दी गई है, जिसके लिए आईआईपी द्वारा सर्वे कार्य आरंभ कर दिया गया है।

आईआईपी के वैज्ञानिक डॉ. पंकज आर्य के अनुसार इस यूनिट में प्रतिदिन लगभग 10 कुंतल ब्रिकेट उत्पादन की क्षमता है। इससे 15 किलोमीटर के दायरे में जंगलों में आग की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगी है।
फिरुल (चीड़ की सूखी पत्तियां) के संग्रह मूल्य में शासन द्वारा की गई बढ़ोतरी से ग्रामीणों की आय में भी इजाफा हुआ है। भिगराड़ा की ग्राम प्रधान गीता भट्ट के नेतृत्व में करीब 80 महिलाओं को इस परियोजना से सीधा रोजगार मिल रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर किए गए सर्वेक्षण में इस अभिनव परियोजना को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली द्वारा प्रतिष्ठित “स्कॉच अवार्ड” से सम्मानित किया गया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर आधारित इस परियोजना पर लगभग 15 लाख रुपये की लागत आई है और इसके लिए 15 किलोवाट का पावर कनेक्शन लिया गया है।
डॉ. आर्य के अनुसार उत्तराखंड में उपलब्ध लगभग 6 लाख मीट्रिक टन फिरुल राज्य की करीब 25 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की क्षमता रखता है। यदि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों में 15 प्रतिशत बायोमास के रूप में फिरुल ब्रिकेट का उपयोग किया जाए, तो हर वर्ष लगभग 260 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है।
स्थानीय स्तर पर भी फिरुल ब्रिकेट की मांग तेजी से बढ़ रही है। भिगराडा़ के समीप गुरुद्वारा श्री रीठा साहिब में इसका सफल ट्रायल हो चुका है। इसके अलावा आवासीय विद्यालयों, मिड-डे मील रसोई, डे-केयर सेंटर और अन्य संस्थानों में भी इसका उपयोग आसानी से किया जा सकता है। इससे गर्मियों में जंगलों में लगने वाली आग और उससे फैलने वाले धुएं पर भी नियंत्रण संभव है।
जिलाधिकारी मनीष कुमार का कहना है कि चंपावत में चीड़ बहुल क्षेत्र अधिक होने के कारण ऐसे और प्लांट स्थापित किए जा सकते हैं। वहीं महिलाओं के रोजगार और स्किल डेवलपमेंट में जुटी एपीडी बिम्मी जोशी ने कहा कि फिरुल ब्रिकेट का कारोबार ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन रहा है।
डॉ. पंकज आर्य ने जानकारी दी कि जल्द ही रुद्रप्रयाग, पौड़ी, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों में भी फिरुल ब्रिकेट निर्माण की यूनिटें स्थापित की जा रही हैं। पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ईंधन और ग्रामीण रोजगार के समन्वय का यह मॉडल चंपावत को देशभर में एक नई पहचान दिला रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस कार्य से जुड़ी सभी एजेंसियों को बधाई देते हुए कहा कि इस अभिनव प्रयोग को देश के अन्य हिमालयी राज्यों के लोग भी इस मांडल को अपने यहां लागू करने के लिए प्रेरित होंगे।
