बसंत पंचमी पर सुरों में खिलती लोहाघाट की कुमाऊनी बैठकी होली।
लोहाघाट। बसंत पंचमी के साथ ही कुमाऊँ अंचल में सुरों का वह उत्सव आरंभ हो जाता है, जिसे कुमाऊनी बैठकी होली के नाम से जाना जाता है। यह होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत, भक्ति और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत संगम है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी कुमाऊँ की सांस्कृतिक आत्मा को सहेजे हुए है।
कुमाऊनी बैठकी होली का इतिहास अल्मोड़ा से जुड़ा माना जाता है, जहाँ से यह परंपरा धीरे-धीरे नैनीताल, पिथौरागढ़, चम्पावत और अन्य क्षेत्रों तक पहुँची। पौष माह के प्रथम रविवार से प्रारंभ होने वाली बैठकी होली, होली टीका तक निरंतर गाई जाती है और पूरे कालखंड में संगीत साधना का अनूठा वातावरण निर्मित करती है।
मां शारदे संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य एवं वरिष्ठ संगीत शिक्षक राजू पंत बताते हैं कि बैठकी होली दो चरणों में संपन्न होती है। पहले चरण को निर्वाण अथवा विष्णुपदी होली कहा जाता है, जो पौष माह से बसंत पंचमी तक चलता है। इस दौरान भक्ति, दर्शन, अध्यात्म और विरह भाव से परिपूर्ण रचनाओं का गायन किया जाता है। दूसरा चरण बसंत पंचमी से होली टीका तक रहता है, जिसे रसिया होली के रूप में जाना जाता है, जिसमें श्रृंगार, हास्य और रंग रस की प्रधानता होती है। शिवरात्रि के बाद होली का उल्लास अबीर-गुलाल के साथ और अधिक मुखर हो उठता है।
लोहाघाट की बैठकी होली कुमाऊँ में अपनी अलग पहचान रखती है। यहां नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के गायक कलाकार एवं संगीतप्रेमी दिन और रात बैठकों का आयोजन करते हैं। विशेष बात यह है कि यहां होली गायन रागों के समयानुसार ही किया जाता है। धमार से प्रारंभ होकर यमन, केदार, हमीर, काफी, जंगला काफी, खमाज, बिहाग, सहाना, जयजयवंती, बागेश्री, झिंझोटी, परज और अंत में भैरवी राग के साथ होली का समापन किया जाता है। समय के साथ भीमपलासी, सारंग, मल्हार, नंद, मारूबिहाग और पुरिया कल्याण जैसे रागों में भी प्रस्तुतियां दी जाने लगी हैं।
लोहाघाट की होली महफिलों में पद्मादत्त पुनेठा, रमेश चंद्र पांडेय, प्रकाश चंद्र पांडे, रमेश चंद्र जोशी, सुनील चंद्र पांडे, प्रणव प्रकाश शर्मा, कमल वर्मा, जगदीश चंद्र खर्कवाल, भुवन भट्ट, किरण जुकरिया और राजू पंत जैसे गायक कलाकार अपनी साधना से सुरों को जीवंत करते हैं। तबले पर लोकेश पाण्डेय, संजय पंत, अंकित जोशी, हरिओम वर्मा, मयंक सामंत और प्रज्ञान पाण्डेय की थाप श्रोताओं को रस में डुबो देती है।
सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लोहाघाट में अपने शास्त्रीय स्वरूप और सांस्कृतिक गरिमा के साथ जीवित है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रही है।
फोटो_ शारदे संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य राजू पंत
चंपावत: बसंत पंचमी विशेष_लोहाघाट में जीवंत है कुमाऊनी बैठकी होली की अनूठी परंपरा।
