चंपावत: पद से नहीं, अपने व्यवहार से पहचान बना गए गिरिजा शंकर जोशी।

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श्रद्धांजलि सभा में पत्रकारों और सूचना विभाग के कर्मचारियों ने नम आंखों से किया याद।

चंपावत। सरकारी सेवा में कई अधिकारी आते हैं और अपनी जिम्मेदारियां निभाकर चले जाते हैं, लेकिन कुछ अधिकारी अपने काम के साथ लोगों के बीच ऐसी पहचान छोड़ जाते हैं, जो पद से कहीं बड़ी होती है। स्व. गिरिजा शंकर जोशी भी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। जिला सूचना अधिकारी के रूप में उन्होंने प्रशासन और पत्रकारों के बीच बेहतर समन्वय बनाने के साथ अपने सहज व्यवहार और सहयोगी स्वभाव से अलग पहचान बनाई।

23 मार्च 1974 को जन्मे गिरिजा शंकर जोशी ने सूचना एवं लोक संपर्क विभाग में सेवाकाल के दौरान पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चंपावत और नैनीताल जनपदों में जिम्मेदारियां निभाईं। अलग-अलग जिलों में तैनाती के दौरान उन्होंने सरकारी दायित्वों के साथ अधिकारियों, कर्मचारियों, पत्रकारों और आम लोगों से आत्मीय संबंध बनाए।

सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी प्रशासन और मीडिया के बीच संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी होती है। जोशी ने इस जिम्मेदारी को केवल सरकारी सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रखा। पत्रकारों की बात सुनना, सवालों पर संवाद करना और जरूरत के समय सहयोग करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा। यही वजह रही कि उनके संपर्क में रहे लोग उन्हें केवल एक अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि सहज और सहयोगी इंसान के रूप में याद करते हैं।

स्व. गिरिजा शंकर जोशी की स्मृति में आज,22 सितंबर को जिला सूचना कार्यालय चंपावत में श्रद्धांजलि एवं शोक सभा आयोजित की गई। इस दौरान पत्रकारों और सूचना विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। सभा में उनके साथ बिताए समय और उनके सरल व्यवहार को याद किया गया।

श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि जोशी ने सरकारी पद की औपचारिकता के बीच भी मानवीय रिश्तों को महत्व दिया। उनके व्यवहार में सहजता थी और संवाद के लिए उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता था। यही वजह रही कि विभिन्न जिलों में सेवा देने के बावजूद उन्होंने लोगों के बीच आत्मीय संबंध बनाए।

पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चंपावत और नैनीताल में उनका सेवाकाल केवल सरकारी जिम्मेदारियों का सफर नहीं रहा। उन्होंने अपने पीछे सहयोग, सादगी और आत्मीय व्यवहार की ऐसी स्मृतियां छोड़ीं, जिन्हें उनके साथ काम करने वाले लोग आज भी याद कर रहे हैं।
सरकारी कुर्सी पर आज कोई और बैठेगा, फाइलों पर किसी और के हस्ताक्षर होंगे, लेकिन लोगों के बीच बनी उनकी पहचान बनी रहेगी। गिरिजा शंकर जोशी की सबसे बड़ी विरासत उनका पद नहीं, बल्कि उन लोगों के दिलों में छोड़ी जगह है, जिन्होंने उनके साथ काम किया और उनके व्यवहार को करीब से महसूस किया।

फोटो_ जिला सूचना कार्यालय में स्व. गिरिजा शंकर जोशी को श्रद्धांजलि अर्पित करते वरिष्ठ पत्रकार गणेश पांडे।


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