प्रशासन मौन, विभागों में जिम्मेदारी का टकराव डाक बंगला क्षेत्र से श्मशान घाट तक बढ़ा अतिक्रमण, पर्यावरण प्रेमियों में आक्रोश।
चंपावत। पहाड़ की खूबसूरती और पहचान माने जाने वाले लोहाघाट में अब अतिक्रमण का ‘हरा हमला’ साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ती आबादी के साथ नगर क्षेत्र में अवैध कब्जों का दायरा तेजी से फैल रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिम्मेदार विभाग सब कुछ देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं।
जहां जिला मुख्यालय के आसपास अधिकतर निजी जमीन होने के कारण लोग अपनी संपत्ति की रक्षा करते हैं, वहीं लोहाघाट में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण मानो आसान रास्ता बन चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं, तभी तो वर्षों से यह खेल खुलेआम जारी है। सबसे चिंताजनक स्थिति डाक बंगला क्षेत्र के आसपास देखने को मिल रही है। यह इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता और घने देवदार के पेड़ों के लिए जाना जाता है, लेकिन अब उन्हीं पेड़ों के बीच अवैध निर्माण और कब्जों ने पर्यावरण को गहरी चोट पहुंचाई है। ढलानों पर फैलते अतिक्रमण ने देवदार वन क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे पर्यावरण प्रेमियों में भारी नाराजगी है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस प्रशासन, वन विभाग और नगर पालिका मौजूद होने के बावजूद कार्रवाई शून्य है। हाल ही में इसी क्षेत्र में प्रशासनिक पहल पर स्वच्छता अभियान भी चलाया गया, जिसमें मुख्य विकास अधिकारी और अपर जिलाधिकारी तक शामिल हुए, लेकिन अतिक्रमण का मुद्दा वहीं का वहीं रह गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी कार्रवाई की बात होती है, ‘ऊपर से फोन’ आ जाते हैं और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। यही वजह है कि अब सवाल उठने लगे हैं क्या जिम्मेदार जानबूझकर खामोश हैं? चौंकाने वाली बात यह भी है कि श्मशान घाट जैसे संवेदनशील स्थल भी अतिक्रमण से अछूते नहीं हैं। बाडीगाड क्षेत्र में अंतिम संस्कार के लिए बने टिन शेड तक कब्जे की जद में आ चुके हैं। नगर के पर्यावरण प्रेमियों ने जिलाधिकारी से सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो लोहाघाट के देवदार के जंगल इतिहास बन जाएंगे। फिलहाल, लोगों की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं देखना यह है कि ‘हरियाली बचाने’ की बात जमीन पर उतरती है या नहीं।
फोटो – लोहाघाट के बाडीगाड नदी में किया गया अतिक्रमण।
चंपावत: लोहाघाट में अतिक्रमण का ‘हरा कत्लेआम’—देवदार के जंगल निगल रहा बेखौफ कब्जा।
