चंपावत में रिवर्स पलायन की नई इबारत, जैविक खेती, डेयरी और होमस्टे से रच रहे सफलता की मिसाल।
लोहाघाट। कभी बेहतर भविष्य की तलाश में पहाड़ के गांवों से लोग मैदानों और महानगरों की ओर पलायन करते थे। आधुनिक खेती और बागवानी सीखने के लिए किसानों को हिमाचल प्रदेश का रुख करना पड़ता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विकासपरक सोच, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती सुविधाओं और स्थानीय स्तर पर मिल रहे प्रोत्साहन ने चम्पावत में रिवर्स पलायन की नई कहानी लिखनी शुरू कर दी है। इस बदलाव की एक प्रेरणादायक मिसाल बने हैं दिल्ली से अपने पैतृक गांव लौटे उच्च शिक्षित राकेश उपाध्याय और उनकी पत्नी हेमा उपाध्याय। जिन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत हों तो पहाड़ की माटी भी सोना उगल सकती है। राकेश दंपति ने गांव लौटने के बाद जैविक खेती, डेयरी, मत्स्य पालन, फल-फूल उत्पादन और औषधीय पौधों की खेती को अपनाया। उन्होंने काली हल्दी सहित कई दुर्लभ और उच्च मूल्य वाली प्रजातियों का उत्पादन शुरू किया है, जो आने वाले समय में बेहतर आय का आधार बन रही हैं। उनके फार्म में दो दर्जन से अधिक दुधारू पशु हैं, जिनसे प्रतिदिन लगभग डेढ़ क्विंटल दूध का उत्पादन हो रहा है। गोबर और गोमूत्र से जैविक खाद तथा प्राकृतिक कीटनाशक तैयार किए जा रहे हैं। खेती और पशुपालन का यह समन्वित मॉडल आज आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का जीवंत उदाहरण बन चुका है।
राकेश दंपति ने अपने फार्म के साथ एक आकर्षक होमस्टे भी विकसित किया है, जहां पर्यटकों को पहाड़ के जैविक उत्पादों से बने पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद चखने का अवसर मिलता है। योग, प्राणायाम और ट्रैकिंग जैसी गतिविधियां भी यहां की विशेष पहचान बन चुकी हैं। फार्म से दिखाई देने वाला हिमालय का विहंगम दृश्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
राकेश बताते हैं कि दिल्ली में नौकरी के दौरान जितनी आय होती थी, उससे लगभग तीन गुना अधिक, यानी 18 से 20 लाख रुपये वार्षिक आय अब गांव में रहकर अर्जित कर रहे हैं। इतना ही नहीं, उनके प्रयासों से स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिल रहा है।
आज जब युवा पीढ़ी खेती और पशुपालन से दूरी बना रही है, वहीं उच्च शिक्षित हेमा उपाध्याय पूरे समर्पण के साथ खेतों और पशुधन की देखभाल में जुटी हैं। उनके हाथ भले ही मिट्टी और गोबर से सने रहते हों, लेकिन चेहरे पर आत्मविश्वास और संतोष की चमक साफ दिखाई देती है। हेमा कहती हैं कि गांव लौटने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया है। प्रकृति के बीच रहकर और खेतों में काम करके न केवल स्वास्थ्य बेहतर हुआ है, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा और संतोष भी मिला है। राकेश और हेमा अपनी सफलता का श्रेय कृषि विज्ञान केंद्र की सब्जी वैज्ञानिक डॉ. रजनी पंत, उद्यान विभाग के अधिकारी आशीष रंजन खर्कवाल तथा पशुपालन विभाग के डॉ. जे.पी. यादव को भी देते हैं। उनका कहना है कि लगातार प्रशिक्षण और वैज्ञानिक मार्गदर्शन ने उन्हें नई तकनीकों को अपनाने और सफल होने का आत्मविश्वास दिया। राकेश का कहना है कि वे स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें मनीष कुमार जैसे जिलाधिकारी मिले, जिनकी सोच और कार्यशैली ने नवाचारों को खेतों तक पहुंचाने का काम किया है। उनका मानना है कि पलायन रोकने और पलायन कर चुके लोगों को पुनः अपनी माटी से जोड़ने की प्रशासनिक सोच ने अनेक लोगों को गांव लौटने के लिए प्रेरित किया है। वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विकास दृष्टि और चम्पावत को मॉडल जिले के रूप में विकसित करने की परिकल्पना ने उनके भीतर अपने गांव लौटकर कुछ नया करने का साहस पैदा किया। इसी सोच ने उन्हें दिल्ली से खींचकर अपने पूर्वजों की माटी से दोबारा जोड़ दिया। आज वे न केवल स्वयं सफल हैं, बल्कि अन्य किसानों और युवाओं को भी वैज्ञानिक खेती, जैविक उत्पादन और ग्रामीण पर्यटन के क्षेत्र में मार्गदर्शन देने का काम कर रहे हैं।
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व्हाट्सएप पर भेजा संदेश, 5 मिनट में मिला जवाब; डीएम की त्वरित कार्यशैली बनी मिसाल।
लोहाघाट। राकेश दंपति के फार्म तक पहुंचने वाली करीब 100 मीटर सड़क की बदहाल स्थिति लंबे समय से परेशानी का कारण बनी हुई थी। खराब सड़क के चलते कृषि उत्पादों के परिवहन और पर्यटकों के आवागमन में कठिनाइयां आ रही थीं। जब इस समस्या की जानकारी एक व्हाट्सएप संदेश के माध्यम से जिलाधिकारी मनीष कुमार तक पहुंचाई गई तो प्रशासन की त्वरित कार्यशैली देखने को मिली। महज पांच मिनट के भीतर जवाब प्राप्त हुआ और कुछ ही देर बाद विकासखंड लोहाघाट के अधिकारियों का फोन आ गया कि सड़क का निरीक्षण और माप-तौल करने के लिए टीम भेजी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की ऐसी संवेदनशील और त्वरित कार्यप्रणाली से लोगों का भरोसा मजबूत हुआ है तथा विकास कार्यों को नई गति मिली है।
चंपावत: दिल्ली की नौकरी छोड़ी, माटी से जोड़ा नाता; अब गांव में कमा रहे 20 लाख सालाना।

