चंपावत: पहाड़ की खेती को बाजार से जोड़ने की ऐतिहासिक पहल से उत्तराखंड विशेषकर पर्वतीय जिलों के किसानों को मिलेगा बेहतर लाभ – राज शेखर जोशी।

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ईमानदारी से लागू हुई योजना, तो पलायन और बिचौलिया व्यवस्था पर लगेगी निर्णायक चोट।


चम्पावत। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों का किसान वर्षों से दोहरी मार झेल रहा है एक ओर कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, दूसरी ओर अपनी उपज का उचित मूल्य न मिलना। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी जब उत्पाद औने-पौने दामों में बिकता है, तो किसान का मन टूटता है और यही पीड़ा उसे गांव छोड़ने तक पर मजबूर कर देती है। ऐसे समय में यदि कोई पहल सीधे किसान को बड़े बाजार से जोड़ने की बात करती है, तो वह केवल योजना नहीं, बल्कि उम्मीद बन जाती है। स्टेट इंस्टीट्यूट फॉर एंपावरिंग एंड ट्रांसफॉर्मिंग उत्तराखंड (सेतु आयोग) के उपाध्यक्ष राजशेखर जोशी द्वारा किसानों को सीधे बड़े खरीददारों से जोड़ने की पहल इसी उम्मीद का संकेत है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत किसान अब अपने उत्पाद सीधे टाटा समूह की ई-ग्रोसरी कंपनी बिगबास्केट को बेच सकेंगे। यदि यह मॉडल पारदर्शिता और प्रतिबद्धता के साथ लागू होता है, तो इससे बिचौलियों की वर्षों पुरानी जकड़न ढीली पड़ सकती है। बताया गया है कि खरीदे गए उत्पादों का भुगतान सीधे किसानों के खातों में किया जाएगा। यह व्यवस्था केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि भरोसे की बहाली भी है। पहाड़ के किसान को सबसे अधिक आवश्यकता इसी विश्वास की है कि उसकी मेहनत का पूरा मूल्य उसे मिलेगा।
प्रथम चरण में नैनीताल के गौलापार और मुक्तेश्वर तथा टिहरी के चंबा में बड़े मार्केटिंग सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। यदि ये केंद्र समय पर शुरू होते हैं और व्यवस्थित ढंग से संचालित किए जाते हैं, तो यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है।
हालांकि, किसी भी योजना की सफलता केवल घोषणा से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से तय होती है। जरूरी है कि किसान उत्पादक समूहों को मजबूत किया जाए, गुणवत्ता मानकों पर प्रशिक्षण दिया जाए और लॉजिस्टिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाए। अन्यथा अच्छी मंशा भी कागजों तक सीमित रह सकती है।
यह पहल केवल खेती का विषय नहीं है; यह पहाड़ की अर्थव्यवस्था, युवाओं के रोजगार और पलायन की समस्या से सीधा जुड़ा प्रश्न है। यदि किसान को उसके खेत से ही सम्मानजनक आय मिलने लगे, तो गांव खाली नहीं होंगे। इसलिए अब निगाहें इस बात पर हैं कि यह महत्वाकांक्षी योजना कितनी तेजी और कितनी गंभीरता से जमीन पर उतरती है। किसान यूनियन भानू के जिलाध्यक्ष नवीन करायत का कहना है कि यदि किसानों के उत्पादों की ऐसी व्यवस्था होती है तो निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि अब किसानों के अच्छे दिन आने वाले हैं।

फोटो – सेतु आयोग के उपाध्यक्ष राजशेखर जोशी।


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