चंपावत: अरुणाचल प्रदेश तक पहुंचा भिंगराड़ा का पिरूल मॉडल, पहाड़ की समस्या को बनाया रोजगार का जरिया।

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चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले के भिंगराड़ा क्षेत्र में पिरूल से तैयार किए जा रहे ईंधन मॉडल ने अब अरुणाचल प्रदेश तक अपनी पहचान बना ली है। जंगलों में गिरने वाला पिरूल, जो लंबे समय से वनाग्नि का बड़ा कारण माना जाता रहा है, आज स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार का माध्यम बन रहा है। भिंगराड़ा में पिरूल को एकत्र कर उससे ब्रिकेट सहित अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने की पहल की जा रही है। इस मॉडल की खासियत यह है कि इसमें जंगलों से निकलने वाले पिरूल का सदुपयोग करने के साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हो रहे हैं।

भिंगराड़ा के इस अभिनव प्रयास को देखने और समझने के लिए अरुणाचल प्रदेश से प्रतिनिधियों ने क्षेत्र का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने पिरूल संग्रहण, उसके प्रसंस्करण तथा तैयार उत्पादों की पूरी प्रक्रिया की जानकारी ली। स्थानीय स्तर पर महिलाओं और ग्रामीणों की भागीदारी को भी प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से देखा।ग्रामीणों का कहना है कि यदि पिरूल का व्यवस्थित तरीके से उपयोग किया जाए तो इससे जंगलों में आग की घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही पिरूल को आय का साधन बनाकर पहाड़ी क्षेत्रों में स्वरोजगार की नई संभावनाएं पैदा की जा सकती हैं।भिंगराड़ा का यह मॉडल अब उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर दूसरे राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। अरुणाचल प्रदेश तक इसकी पहुंच इस बात का संकेत है कि स्थानीय संसाधनों पर आधारित छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव की नींव रख सकते हैं। पहाड़ों में उपलब्ध पिरूल जैसी प्राकृतिक सामग्री को समस्या के बजाय संसाधन के रूप में उपयोग करने की यह पहल पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

फोटो_पिरूल ब्रिकेटिंग यूनिट का निरीक्षण करते अरुणाचल  प्रदेश के उच्च अधिकारी I


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