

पूर्वज के बलिदान से जुड़ी मां पूर्णागिरि की चमत्कारी गाथा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है अनूठी परंपरा।
लोहाघाट। किसी गांव की पहचान उसकी संस्कृति, परंपरा और इतिहास से होती है, लेकिन खूना बोरा गांव की पहचान यहां के लोगों की जीभ से जुड़ी है। मान्यता है कि गांव के बोरा वंश के स्त्री-पुरुषों की जीभ चपटी है। ग्रामीण इसे मां पूर्णागिरि के आशीर्वाद और अपने पूर्वज के अद्भुत बलिदान की निशानी मानते हैं। सदियों पुरानी यह लोकगाथा आज भी गांव की आस्था, पहचान और गौरव का हिस्सा बनी हुई है।
लोकमान्यता के अनुसार, राणाओं के अत्याचारों से त्रस्त ग्रामीणों के सामने जब अपने वंश की रक्षा का संकट खड़ा हुआ, तब गांव के एक बुजुर्ग मां पूर्णागिरि की शरण में पहुंचे। मां को अर्पित करने के लिए कोई भेंट न होने पर उन्होंने अपनी जीभ काटकर देवी को समर्पित कर दी। भक्त की इस अनूठी तपस्या और समर्पण से प्रसन्न होकर मां पूर्णागिरि ने उन्हें दर्शन दिए और उनके साथ गांव चली आईं।
कहा जाता है कि मां ने मानेश्वर के निकट एक पहाड़ी पर अपना वास बनाया और बोरा वंश को आशीर्वाद दिया कि उनकी जीभ चपटी रहेगी, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस आस्था और बलिदान की गाथा को कभी न भूलें। मां ने यह वरदान भी दिया कि भक्तों को उनकी आराधना के लिए पूर्णागिरि धाम तक जाने की आवश्यकता नहीं होगी। मानेश्वर धाम में पूजा-अर्चना के बाद यहां मां के दर्शन करने से भी समान पुण्य प्राप्त होगा। इसी मान्यता के साथ ग्रामीण पीढ़ियों से मां की आराधना करते आ रहे हैं। अब यहां मां पूर्णागिरि का भव्य मंदिर भी स्थापित है।
शरद पूर्णिमा पर उमड़ता है आस्था का सैलाब_
खूना बोरा गांव में हर वर्ष शरद पूर्णिमा पर मां पूर्णागिरि का विशाल मेला लगता है। इस दौरान देश-प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर बसे बोरा परिवार अपनी कुलदेवी के दर्शन के लिए गांव लौटते हैं। बुजुर्ग हयात सिंह, हरी सिंह और बहादुर सिंह का कहना है कि मां के आगमन के बाद से गांव में सुख-समृद्धि बनी हुई है। वहीं, नवीन बोरा, कैलाश बोरा और भइयू बोरा समेत गांव के युवा इस विरासत को अपनी पहचान और गौरव मानते हैं।
युवाओं की पहल पर पिछले कई वर्षों से यहां तीन दिवसीय मां पूर्णागिरि महोत्सव भी आयोजित किया जा रहा है। महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। आस्था की यह अनूठी परंपरा आज भी नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही है।
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मानेश्वर धाम-जहां अर्जुन के बाण से फूटी थी जलधारा!
मां पूर्णागिरि के शिखर के समीप स्थित मानेश्वर धाम भी अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। धाम के पीठाधीश्वर धर्मराज पुरी महाराज के आगमन के बाद यहां विकास और व्यवस्थाओं में बदलाव आया है।
धर्मराज पुरी के अनुसार, वनवास काल में पांडव यहां रुके थे। पिता के श्राद्ध के लिए मानसरोवर जाने की आवश्यकता थी, लेकिन खराब मौसम के कारण रास्ता बंद हो गया। युधिष्ठिर को चिंतित देखकर अर्जुन ने मानसरोवर के जल का आह्वान करते हुए अपने बाण से धरती पर प्रहार किया, जिससे यहां जलधारा फूट पड़ी।
मान्यता है कि यह जलधारा भीषण गर्मी में भी नहीं सूखती। इसके जल से अभिषेक करना मानसरोवर में स्नान करने के समान पुण्यदायी माना जाता है। यही मान्यताएं मानेश्वर धाम को श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनाती हैं।
फोटो_ चपटी जीभ दिखाकर अपनी अनूठी परंपरा और पूर्वजों से जुड़ी मान्यता को प्रदर्शित करते खूना बोरा गांव के ग्रामीण।




