नए प्रभारी मंत्री से उम्मीदें डेयरी, इंटीग्रेटेड फार्मिंग और कुटीर उद्योगों में दिखेगा बदलाव या फिर वही पुरानी कहानी ?
चंपावत। मुख्यमंत्री की परिकल्पना के मॉडल जिले के रूप में पहचाने जाने वाले चंपावत में जिला योजना के माध्यम से ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन की जो उम्मीदें थीं, वे अब तक धरातल पर नजर नहीं आ रही हैं। हालात यह हैं कि योजनाओं की गति सुस्त है और आम जनता को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है।
जिले का दुर्भाग्य रहा है कि अब तक ऐसे प्रभारी मंत्री मिले, जिनके कार्यकाल में आम जनता को राहत कम और परेशानियां अधिक झेलनी पड़ीं। हालांकि, यह एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है कि अब जिले को एक जमीन से जुड़े प्रभारी मंत्री मिले हैं। उनके अनुभव का लाभ चंपावत को कितना मिलेगा और रोजगारपरक योजनाएं कितनी तेजी से आगे बढ़ेंगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
जिले में दुग्ध उत्पादन की अपार संभावनाएं होने के बावजूद पशुपालकों को बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेलना पड़ रहा है। अधिकांश गौशालाएं व्यवस्थित नहीं हैं, चारा प्रबंधन के लिए चापाकटर और नांद जैसी सुविधाएं नहीं हैं। यदि मिल्क इंड्यूसिंग किट जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए तो न केवल दूध उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि बेसहारा पशुओं की समस्या भी कम हो सकती है।
इंटीग्रेटेड फार्मिंग की दिशा में भी चंपावत में व्यापक संभावनाएं हैं। यदि एक किसान को सीमित भूमि पर मधुमक्खी पालन, मछली पालन, मुर्गी पालन, दुग्ध उत्पादन, मशरूम, रेशम, जड़ी-बूटी और बकरी पालन जैसी गतिविधियों को एक साथ जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, तो यह रोजगार का मजबूत मॉडल बन सकता है। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र, लोहाघाट में एक प्रदर्शन इकाई स्थापित करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
मधुमक्खी पालन को कुटीर उद्योग के रूप में विकसित करने, “हनी बैंक” स्थापित करने और स्थानीय स्तर पर बीज उत्पादन को बढ़ावा देने से भी किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है। वहीं, छोटे किसानों के लिए बंद किए गए छोटे पॉलीहाउस को फिर से शुरू करना जरूरी है, ताकि सीमित संसाधनों वाले काश्तकार भी आधुनिक खेती से जुड़ सकें।
जिले में फल, फूल और सब्जियों का अच्छा उत्पादन होने के बावजूद मंडियों का अभाव किसानों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है। इसके साथ ही खादी ग्रामोद्योग और जड़ी-बूटी अनुसंधान केंद्र की स्थापना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि जिला योजना के कार्यों के लिए समय पर धनराशि जारी हो और कार्यों को तय समय सीमा में पूरा किया जाए। वर्तमान में कई योजनाएं अधूरी पड़ी हैं, जो व्यवस्था की सुस्ती को उजागर करती हैं। साथ ही, जिला योजना के धन का उपयोग जनहित और रोजगारपरक योजनाओं में हो, न कि व्यक्तिगत हितों को साधने में—इसके लिए सख्त निगरानी की आवश्यकता है। अब देखना होगा कि नए प्रभारी मंत्री के नेतृत्व में चंपावत विकास और रोजगार की दिशा में नई इबारत लिखता है या फिर उम्मीदें एक बार फिर अधूरी रह जाती हैं।
चंपावत: जिला योजना की रफ्तार सुस्त, चंपावत में रोजगार की खुशबू अब तक गायब।
