चंपावत: बाराही धाम की अनोखी परंपरा, आज तक किसी ने नहीं किए मां बाराही की मूर्ति के प्रत्यक्ष दर्शन।

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रक्षाबंधन पर साल में एक बार नंदघर में विराजता है पवित्र सिंहासन, निसंतान महिलाएं रातभर दीप जलाकर करती हैं संतान प्राप्ति की कामना।

देवीधुरा। उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित देवीधुरा का मां बाराही धाम अपनी चमत्कारिक मान्यताओं और ऐतिहासिक बग्वाल के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यहां की धार्मिक परंपराएं जितनी अनूठी हैं, उतनी ही रहस्यमयी मां बाराही की प्रतिमा से जुड़ी मान्यताएं भी हैं। मान्यता है कि आज तक किसी ने भी मां बाराही की मूल मूर्ति के प्रत्यक्ष रूप से दर्शन नहीं किए हैं। श्रद्धालुओं के लिए मां का पवित्र सिंहासन ही आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार मुगल शासनकाल के दौरान आक्रांताओं द्वारा मां बाराही की मूर्ति को लूटकर ले जाने का प्रयास किया गया था। इस दौरान क्षेत्र के लमगड़िया खाम के लोगों और सुनीगांव के बाड़ियों ने उनका मुकाबला कर मूर्ति को वापस प्राप्त किया। कहा जाता है कि कौतूहलवश आक्रांताओं ने दिन के समय मां बाराही की मूर्ति पर रखा वस्त्र हटाया तो तेज प्रकाश से उनकी आंखें चौंधिया गईं और उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी। इसके बाद से मां की मूल प्रतिमा को विशेष तांबे के सिंहासन में विराजमान किए जाने की परंपरा चली आ रही है।

इस पवित्र सिंहासन में मां बाराही के साथ मां महाकाली और मां सरस्वती की मूर्तियां भी विराजमान हैं। वर्तमान में यह सिंहासन मंदिर की दूसरी मंजिल पर मां बाराही की अष्टभुजा प्रतिमा के समीप रखा जाता है। वर्ष में केवल एक बार रक्षाबंधन यानी बग्वाल के दिन इसे मंदिर के समीप स्थित नंदघर में विराजमान किया जाता है।

इस दिन मां के दर्शन और आशीर्वाद की कामना लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु नंदघर पहुंचते हैं। विशेष रूप से निसंतान महिलाएं निर्जल उपवास रखकर रातभर हाथों में दीपक लेकर मां बाराही से संतान प्राप्ति की प्रार्थना करती हैं। अगले दिन बागड़ जाति के व्यक्ति आंखों पर पट्टी बांधकर परंपरागत विधि-विधान के बीच पवित्र मूर्तियों को गंगाजल और दूध से स्नान कराते हैं। इसके बाद मां को नए परिधान और आभूषण धारण कराए जाते हैं।

इसी अवसर पर मां बाराही की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। जयकारों के बीच श्रद्धालुओं का सैलाब शोभायात्रा में शामिल होता है। शोभायात्रा मंदिर के समीप पहाड़ी पर स्थित मुचकंद ऋषि के आश्रम तक पहुंचती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार काल भैरव संग्राम में मुचकंद ऋषि द्वारा देवताओं की सहायता किए जाने से प्रसन्न होकर मां बाराही ने उन्हें चिरनिद्रा में लीन होने के बाद स्वयं दर्शन देने का वरदान दिया था। इसी मान्यता के चलते सदियों से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

बाराही धाम की यह परंपरा धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है, जो हर वर्ष बग्वाल के दौरान देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनती है।

फोटो_ देवीधुरा बाराही धाम में विशेष तांबे के सिंहासन में विराजमान मां बाराही, मां महाकाली एवं मां सरस्वती की पवित्र प्रतिमाएं।


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