

आचार्य प्रकाश कृष्ण शास्त्री ने बताए श्राद्ध कर्म के विधान, सात्विक आहार और पंचबली का महत्व।
लोहाघाट। पितृपक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में विधि-विधान से किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों की तृप्ति और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। कथावाचक आचार्य प्रकाश कृष्ण शास्त्री ने पितृपक्ष में किए जाने वाले प्रमुख कर्मों और परंपराओं की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि पितृपक्ष में प्रतिदिन तर्पण और संबंधित तिथि पर पिंडदान किया जाता है। पके चावल, दूध और तिल से पिंड तैयार करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता में पिंड को पितरों के प्रतीक के रूप में माना जाता है।
आचार्य शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध के दौरान सात्विक आहार और संयम का विशेष महत्व है। मांसाहार, लहसुन-प्याज और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। अनावश्यक खरीदारी और नए वस्त्र लेने से भी बचने की परंपरा है। श्राद्ध के दिन पितर की पसंद के अनुसार सात्विक भोजन तैयार करने की मान्यता है।
श्राद्ध कर्म में पंचबली का भी विधान है। इसके तहत गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं और चींटियों के लिए भोजन अर्पित किया जाता है। आचार्य शास्त्री ने कहा कि पंचबली का उद्देश्य जीवों के प्रति करुणा और अन्न साझा करने की भावना को बढ़ाना है। इसमें किसी प्रकार की पशु हिंसा का विधान नहीं है। श्राद्ध कर्म के बाद पुरोहित को भोजन कराने और दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा करने की परंपरा है। ब्राह्मण के भोजन ग्रहण नहीं कर पाने की स्थिति में दाल, चावल, चीनी, नमक, मसाले, सब्जियां और फल आदि देने की परंपरा बताई गई है।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध कर्म के समापन पर पितरों से जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए क्षमा याचना करनी चाहिए और परिवार पर उनका आशीर्वाद बनाए रखने की प्रार्थना करनी चाहिए।
फोटो_ पितृपक्ष के विधान की जानकारी देते कथावाचक आचार्य प्रकाश कृष्ण शास्त्री।




