चंपावत में अस्पतालों की ‘व्यवस्था’ पर वार! मरीज परेशान, व्यवहार पर भी उठे सवाल।

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लोहाघाट के बाद जिला अस्पताल भी सवालों के घेरे में, वृद्धा के इलाज से लेकर एमआरआई जांच तक उठे गंभीर आरोप; अस्पताल प्रशासन की चुप्पी पर भी सवाल

चंपावत। जिले की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर शिकायतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। लोहाघाट उपजिला चिकित्सालय में विधायक खुशाल सिंह अधिकारी के साथ कथित अभद्र व्यवहार का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि अब जिला अस्पताल की आपातकालीन सेवा और एमआरआई जांच व्यवस्था को लेकर दो नए मामले सामने आ गए हैं। घटनाओं ने अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली और मरीजों के प्रति संवेदनशीलता पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘सबका विकास पार्टी’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हरीश चंद्र शर्मा ने आरोप लगाया कि वह अपनी 76 वर्षीय वृद्ध माता को उपचार के लिए जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। उनका आरोप है कि गंभीर अवस्था में प्राथमिक उपचार को प्राथमिकता देने के बजाय औपचारिकताओं पर जोर दिया गया और कर्मचारियों का व्यवहार भी अभद्र रहा। उनका कहना है कि अस्पताल जैसी संवेदनशील जगह पर मरीज और तीमारदारों के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
वहीं बाराकोट क्षेत्र से जिला अस्पताल पहुंचे एक मरीज ने आरोप लगाया कि 18 जुलाई को निर्धारित एमआरआई जांच टेक्नीशियन उपलब्ध न होने के कारण नहीं हो सकी। मरीज के अनुसार, जांच क्यों नहीं हो पाई और आगे कब होगी, इसकी जानकारी लेने पर भी उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सवाल यह है कि जब मरीज दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों से इलाज की उम्मीद लेकर जिला अस्पताल पहुंचते हैं, तो उन्हें जांच और उपचार के लिए भटकना क्यों पड़ रहा है?

सुविधाएं बढ़ीं, फिर भी सवाल क्यों?

जिला अस्पताल में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के दावे लगातार किए जाते रहे हैं, लेकिन मरीजों की शिकायतें इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही हैं। कहीं मशीन है तो तकनीशियन नहीं, कहीं इलाज है तो व्यवहार पर सवाल—ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मरीज जाएं तो जाएं कहां?
अस्पताल प्रशासन की ओर से दोनों मामलों में अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही वजह है कि जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज कर दी है।
लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पताल जनता के भरोसे का आखिरी सहारा हैं। यहां मशीनों और भवनों से ज्यादा जरूरी है समय पर इलाज, संवेदनशील व्यवहार और जवाबदेही। यदि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो केवल जांच नहीं, बल्कि व्यवस्था में जिम्मेदारी तय कर ठोस सुधार की जरूरत है।

फोटो/व्यूजल_ नरेंद्र उत्तराखंडी।


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