उच्चहिमालयी क्षेत्रों में प्रथम पंक्ति में स्थित गांवो में आज समग्र बदलाव का अध्ययन करने के लिए एवं ग्रामीणों से संवाद करने आई है युवाओं टीम।
लोहाघाट। भारत-नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में तैनात आईटीबीपी केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सीमांत समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य विकास की मजबूत साझेदार बनकर उभरी है। दशकों से सीमांत क्षेत्रों में आईटीबीपी और स्थानीय लोगों के बीच ऐसा आत्मीय रिश्ता बना है, जिसने पलायन की मार झेल रहे गांवों में नई उम्मीद और रौनक का संचार किया है। इसी बदलाव का अध्ययन करने के लिए भारत सरकार के तत्वावधान में युवाओं का एक दल इन दिनों उच्च हिमालयी क्षेत्रों का भ्रमण कर स्थानीय लोगों से संवाद कर रहा है। आईटीबीपी की 36वीं वाहिनी के कमांडेंट संजय कुमार ने दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। द्वितीय कमान अधिकारी डॉ. सुबे सिंह के नेतृत्व में 13 स्वयंसेवी युवाओं का यह दल सोबला, दर, सेला समेत दारमाघाटी के कई सीमांत गांवों का दौरा कर रहा है। इस अध्ययन अभियान में ‘माय भारत’ के स्वयंसेवक भी शामिल हैं।
युवाओं ने पाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सीमांत गांवों को देश के “प्रथम गांव” के रूप में पहचान दिए जाने के बाद यहां के लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है। प्रधानमंत्री की क्षेत्रीय यात्रा और धार्मिक पर्यटन को मिली नई दिशा से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं।
आईटीबीपी द्वारा सीमांत क्षेत्रों में उत्पादित जैविक कृषि उत्पादों की खरीद किए जाने से ग्रामीणों को घर के नजदीक ही भरोसेमंद बाजार उपलब्ध हुआ है। इससे किसानों और पशुपालकों की आय में वृद्धि हुई है। आईटीबीपी के अपर महानिदेशक संजय गुंज्याल की पहल का सकारात्मक प्रभाव भी क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। स्थानीय नस्ल की बद्री गाय के संरक्षण और संवर्धन में भी आईटीबीपी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ‘प्रकृति की मोबाइल डिस्पेंसरी’ कही जाने वाली बद्री गाय का घी बाजार में लगभग सात हजार रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है, जबकि इसके गौमूत्र की मांग भी लगातार बढ़ रही है। इससे पशुपालन को नया प्रोत्साहन मिला है। सीमांत गांवों में लोगों के चेहरों पर दिख रही मुस्कान इस बात का प्रमाण है कि सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक उत्थान के लिए भारत सरकार और आईटीबीपी द्वारा किए जा रहे प्रयास सफल हो रहे हैं। युवाओं ने भी माना कि सीमांत क्षेत्रों में विकास, आत्मविश्वास और राष्ट्रभक्ति का जो वातावरण दिखाई दे रहा है, वह देश की सीमाओं को और अधिक मजबूत बना रहा है।
फोटो – प्रथम गांव में स्थानीय ग्रामीणों से संवाद करती युवा स्वयंसेवकों की टीम।
चंपावत: सीमाओं की सुरक्षा से आगे बढ़कर समाज परिवर्तन का माध्यम बनी आईटीबीपी, सीमांत गांवों में लौटी रौनक।

