कत्यूरी और चंद शासनकाल की शौर्य गाथाओं के साक्षी बने हैं सदियों पुराने प्रस्तर स्तंभ।
लोहाघाट। उत्तराखंड के चंपावत जनपद के बाराकोट विकासखंड अंतर्गत स्थित रेगड़ू महादेव मंदिर परिसर आज भी इतिहास, वीरता और लोक आस्था की अनमोल धरोहर को संजोए हुए है। मंदिर परिसर में स्थापित प्राचीन वीर खंभ (वीरखाम्ब/बिरखम) कत्यूरी शासन के बाद चंद राजवंश काल की स्थापत्य कला, शौर्य और लोक संस्कृति के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं।
इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार ‘वीरखंभ’ वास्तव में विजय स्तंभ या कीर्ति स्तंभ होते थे। इन्हें प्राचीन काल में किसी वीर योद्धा, सेनापति या राजा की वीरता और युद्ध में मिली विजय की स्मृति को अमर बनाने के लिए स्थापित किया जाता था। ये विशाल पत्थर के नक्काशीदार खंभे आज भी उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहते नजर आते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार रेगड़ू महादेव परिसर और आसपास स्थापित इन वीर खंभों का संबंध चंद शासनकाल से माना जाता है। कहा जाता है कि जब कोई वीर योद्धा मातृभूमि और राज्य की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त होता था, तब उसकी स्मृति में ऐसे प्रस्तर स्तंभ स्थापित किए जाते थे। समय बीतने के साथ ये वीर खंभ लोक आस्था का केंद्र बन गए और लोगों ने इन्हें लोक देवताओं के रूप में पूजना शुरू कर दिया।
रेगड़ू क्षेत्र के 101 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक एवं सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक मोती सिंह मेहता के अनुसार कत्यूरी शासन के बाद लगभग 13वीं शताब्दी में चंदवंशी वंश के लोग इस क्षेत्र में आए, जिन्हें बाद में मेहता कहा जाने लगा। उनके अनुसार मेहता समाज के पूर्वज राम सिंह चंद चंपावत से रेगड़ू आए थे। लोक कथाओं के अनुसार मानेश्वर में स्थित प्रसिद्ध देवदार का पेड़ भी उन्हीं के द्वारा लगाया गया था, जिसे आज भी लोग “रमई दयार” के नाम से जानते हैं।
उन्होंने बताया कि राम सिंह चंद के दो पुत्र ज्ञान चंद और ध्यान चंद हुए। ज्ञान चंद को राई और चाक मेहता गांवों का पूर्वज माना जाता है, जबकि ध्यान चंद को छंदा और खकोड़ा गांवों का पूर्वज माना जाता है। उल्लेखनीय है कि नौ गांव रेगड़ू क्षेत्र में चार गांव मेहता समाज के हैं।
मंदिर परिसर में स्थापित इन वीर खंभों पर त्रिशूल, तलवार, ढाल तथा प्राचीन आकृतियों की नक्काशी आज भी देखने को मिलती है, जो तत्कालीन युद्ध संस्कृति और वीर परंपरा की झलक प्रस्तुत करती है।
कुमाऊं के इतिहास में वीरखंभ केवल पत्थर के खंभे नहीं, बल्कि शौर्य, बलिदान और पूर्वजों की अमर गाथाओं के प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें आज भी स्थानीय लोग श्रद्धा और गर्व के साथ याद करते हैं।
फोटो – रेगड़ू महादेव मंदिर परिसर में स्थापित प्राचीन वीर खंभ, जो क्षेत्र के वीर योद्धाओं की शौर्य गाथा और चंदकालीन इतिहास की याद दिलाते हैं।
चंपावत: रेगड़ू महादेव मंदिर के वीर खंभ बयां करते हैं पूर्वजों की वीरता और गौरवशाली इतिहास।

