

जनता की समस्याओं के समाधान के लिए भोजन तक छोड़ देते हैं जिलाधिकारी, सुबह से देर रात तक विकास कार्यों और जनसुनवाई में रहते हैं व्यस्त
चंपावत। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच जनता की सेवा को प्राथमिकता देने वाले अधिकारी कम ही देखने को मिलते हैं। चंपावत के जिलाधिकारी मनीष कुमार की कार्यशैली इन दिनों इसी वजह से चर्चा में है। जिले के विकास और आम जनता की समस्याओं के समाधान को लेकर उनकी सक्रियता का आलम यह है कि कई बार काम की व्यस्तता के चलते उन्हें अपने भोजन तक के लिए समय नहीं मिल पाता। जनता का काम पहले और अपना आराम बाद में, उनकी दिनचर्या कुछ ऐसी ही नजर आती है।
सुबह कार्यालय पहुंचने के साथ ही उनके कामकाज का सिलसिला शुरू हो जाता है। कभी अधिकारियों के साथ बैठक, कभी विकास योजनाओं की समीक्षा, कभी निर्माण कार्यों का स्थलीय निरीक्षण तो कभी दूरदराज के क्षेत्रों से पहुंचे फरियादियों की समस्याएं सुनना। दिनभर एक के बाद एक जिम्मेदारियों के बीच वह लगातार सक्रिय रहते हैं। कई बार जरूरी काम और जनसमस्याओं के निस्तारण के चलते भोजन का समय भी निकल जाता है, लेकिन काम की रफ्तार थमती नजर नहीं आती।
जिले के दूरस्थ गांवों की सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मामलों पर भी उनकी नजर रहती है। विकास योजनाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें, इसके लिए वह अधिकारियों से प्रगति की जानकारी लेने के साथ ही जमीनी स्तर पर कार्यों की स्थिति जानने पर जोर देते हैं। जनता मिलन और जनसुनवाई के दौरान आम लोगों की शिकायतों को सुनना तथा संबंधित अधिकारियों को समाधान के निर्देश देना भी उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जिलाधिकारी की व्यस्तता केवल सरकारी बैठकों तक सीमित नहीं रहती। जिले में किसी भी महत्वपूर्ण गतिविधि, आपदा प्रबंधन, प्रशासनिक व्यवस्था या जनहित से जुड़े मामले में उनकी सक्रियता बनी रहती है। मोबाइल और अन्य माध्यमों से भी प्रशासनिक कामकाज पर नजर रखने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि उनकी दिनचर्या में निजी समय निकालना भी चुनौती बन जाता है।
आज के दौर में जहां सरकारी कार्यालयों में कामकाज की गति और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं, वहीं जिलाधिकारी मनीष कुमार की यह कार्यशैली प्रशासनिक जिम्मेदारियों के प्रति समर्पण की एक अलग तस्वीर पेश करती है।
आखिर जिलाधिकारी की कुर्सी सिर्फ अधिकारों का पद नहीं, बल्कि लाखों लोगों की उम्मीदों और भरोसे की जिम्मेदारी भी है। अपने भोजन और आराम तक को पीछे छोड़कर जनता के काम में जुटे रहने की यह तस्वीर बताती है कि प्रशासनिक सेवा में समय की नहीं, जिम्मेदारी की अहमियत सबसे बड़ी होती है।
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जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी निभाते तो जिलाधिकारी को इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती!
जनप्रतिनिधियों से भी सवाल पूछना जरूरी है कि आखिर उनकी जिम्मेदारी क्या है? जनता ने उन्हें क्षेत्र की समस्याओं को उठाने, विकास कार्यों को गति देने और सरकार तक जनता की आवाज पहुंचाने के लिए चुना है, लेकिन यदि नेता ही अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाएं तो प्रशासन पर अतिरिक्त बोझ पड़ना स्वाभाविक है।
सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और रोजगार जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए जिलाधिकारी मनीष कुमार को ही क्यों बार-बार मशक्कत करनी पड़े? यदि जनप्रतिनिधि समय रहते अपनी सक्रियता दिखाएं और संबंधित विभागों के सामने जनता का पक्ष मजबूती से रखें तो जिलाधिकारी को भी हर समस्या के पीछे इतनी भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी। विडंबना देखिए, जनता ने नेताओं को अपना प्रतिनिधि बनाया और जनता के काम के लिए जिलाधिकारी को अपना भोजन तक छोड़ना पड़ रहा है। आखिर जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी कब निभाएंगे? क्या जनता ने उन्हें सिर्फ चुनाव के समय वोट मांगने के लिए चुना है?
फोटो_ पूर्व में जनता के बीच पहुंचकर समस्याएं सुनते और समाधान का भरोसा दिलाते जिलाधिकारी मनीष कुमार।







