चंपावत: बिरुड़ा पंचमी और घी त्यार ने सजाया पहाड़ का लोकजीवन।

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बदलते दौर में भी कायम हैं लोकपरंपराएं, घर-आंगन में गूंजा संस्कृति और आस्था का स्वर।

चंपावत। पहाड़ की पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता के साथ सदियों पुरानी लोकपरंपराओं से भी है। बिरुड़ा पंचमी और घी संक्रांति यानी घी त्यार के पर्व पर कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत घर-आंगन में जीवंत नजर आई। महिलाओं ने विधि-विधान से परंपराएं निभाईं और पारंपरिक पकवानों ने पर्व का रंग और गहरा कर दिया।
रक्षाबंधन से पहले मनाई जाने वाली बिरुड़ा पंचमी पर विभिन्न दालों और अनाजों को साफ कर विधि-विधान से भिगोया गया। बिरुड़ों को पूजा स्थल पर रखकर परिवार की सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि की कामना की गई।

चंपावत में मनोरमा पांडे, निर्मला बोहरा, नीलम पांडे, हिमानी पांडे, रेखा पांडे और हेमा पांडे ने भी श्रद्धा के साथ यह परंपरा निभाई। उन्होंने कहा कि लोकपर्व संस्कृति और पारिवारिक संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम हैं।

वहीं घी संक्रांति यानी घी त्यार पहाड़ के कृषि और पशुपालन आधारित जीवन का प्रतीक है। घरों में रोट, पूरी, अरसा समेत घी से बने पारंपरिक पकवान तैयार किए गए। यह पर्व कृषि, पशुधन, ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना से जुड़ा है।
बदलती जीवनशैली और पलायन के बीच कई लोकपरंपराएं कमजोर पड़ रही हैं, लेकिन बिरुड़ा पंचमी और घी त्यार आज भी पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से थामे हुए हैं। बुजुर्गों के अनुसार इन पर्वों को जीवित रखना अपनी जड़ों और पहचान को बचाए रखना है।

फोटो_ बिरुड़ा पंचमी पर आस्था और संस्कृति की अनूठी तस्वीर पेश करतीं महिलाएं।


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