

देहरादून/चंपावत। कभी पहाड़ के गांवों की सुबह घराट की घरघराहट से हुआ करती थी। गाड़-गधेरों और नदियों के किनारे पानी की धार से चलने वाले घराट ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। गेहूं, मक्का और मड़ुवा जैसे अनाज की पिसाई के साथ ये घराट पहाड़ की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक तकनीक की पहचान भी थे। मगर आधुनिक चक्कियों के बढ़ते चलन और सरकारी संरक्षण की कमजोर कवायद के बीच पहाड़ की यह सदियों पुरानी विरासत अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
राज्य गठन के बाद पारंपरिक घराटों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) के माध्यम से योजनाएं शुरू की गईं। पुराने घराटों के जीर्णोद्धार के साथ नए घराट स्थापित करने और पानी की ऊर्जा का इस्तेमाल कर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली उत्पादन की संभावनाएं तलाशने की बात कही गई। घराटों को ग्रामीण रोजगार और लघु उद्योगों से जोड़ने के दावे भी किए गए। इसके बावजूद कई स्थानों पर बनाए गए या पुनर्जीवित किए गए घराट कुछ समय बाद ही बंद हो गए। कहीं जलप्रवाह में कमी तो कहीं तकनीकी दिक्कतों को इसकी वजह बताया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि योजना तैयार करने से पहले जलप्रवाह का वैज्ञानिक आकलन क्यों नहीं किया गया? यदि किसी स्थान पर सालभर पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं था तो वहां सरकारी धन खर्च कर घराट स्थापित करने का औचित्य क्या था?
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बंद होते घराट, खत्म होती विरासत_
बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चंपावत समेत कुमाऊं-गढ़वाल के कई जिलों में कभी घराट बड़ी संख्या में संचालित होते थे। 1990 के दशक के बाद बिजली और डीजल से चलने वाली आधुनिक चक्कियों का चलन बढ़ने के साथ घराटों का इस्तेमाल तेजी से घटता गया। आज बचे हुए अधिकांश घराट या तो बंद पड़े हैं या जर्जर हालत में हैं।
घराटों के साथ केवल एक पारंपरिक पिसाई व्यवस्था ही खत्म नहीं हो रही, बल्कि पानी की ऊर्जा के उपयोग, स्थानीय संसाधनों और सदियों पुराने तकनीकी ज्ञान की विरासत भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है।

निर्माण के बाद जिम्मेदारी किसकी?
घराट संरक्षण को लेकर सबसे बड़ा सवाल योजनाओं के क्रियान्वयन और रखरखाव पर है। निर्माण के बाद नियमित देखरेख, तकनीकी सहायता, जलप्रवाह की निगरानी और स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी किसकी है, इसका स्पष्ट जवाब सामने नहीं आता।
जानकारों का मानना है कि घराटों को बचाने के लिए अब केवल निर्माण आधारित योजनाओं के बजाय संचालन आधारित नीति की जरूरत है। पुराने घराटों का जिलेवार सर्वे कर उनकी स्थिति दर्ज की जाए। जलस्रोतों और जलप्रवाह का वैज्ञानिक आकलन हो तथा स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
घराटों को स्थानीय अनाजों की प्रसंस्करण इकाइयों, ग्रामीण लघु उद्योगों और जहां संभव हो वहां सूक्ष्म पनबिजली परियोजनाओं से जोड़कर इन्हें रोजगार और आय का माध्यम बनाया जा सकता है।
सरकार के सामने अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने घराट बनाए गए, बल्कि यह होना चाहिए कि उनमें से कितने आज भी चल रहे हैं। यदि पहाड़ की इस सदियों पुरानी तकनीक को समय रहते नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियां घराट की घरघराहट को सिर्फ इतिहास और तस्वीरों में ही देख-सुन पाएंगी।
फोटो_आज वही घराट खामोश हैं—समय की मार और बदलते दौर में एक पूरी विरासत धीरे-धीरे मिटने की कहानी कह रहे हैं।




