

मंदिरों की विशेष सफाई के बाद पंचगव्य का छिड़काव, एक साल के लिए बदले बाराही धाम के पुजारी।
देवीधुरा। विश्व प्रसिद्ध बाराही धाम में बग्वाल मेले के बीच शताब्दियों पुरानी धार्मिक परंपराओं का विधिवत निर्वहन किया गया। मुख्य बाजार बाराही की शोभायात्रा के दूसरे दिन धाम परिसर स्थित मंदिरों और धार्मिक स्थलों की विशेष सफाई की गई। इसके बाद पंचगव्य का छिड़काव कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। बाराही धाम की तीन विशाल शिलाओं के बीच स्थित पवित्र गब्यूरी में भी विशेष अनुष्ठान हुआ।
मान्यता है कि यहां अखंड ज्योति शताब्दियों से प्रज्वलित है और वर्ष में इसी दिन गब्यूरी की विशेष सफाई की जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार क्षेत्र में सूखे की स्थिति बनने पर श्रद्धालु यहां जलधारा अर्पित करते हैं। आस्था है कि इसके बाद मेघ प्रसन्न होते हैं और क्षेत्र में वर्षा होती है।
इसी अवसर पर धाम के प्राचीन नौले की भी विशेष सफाई और पूजा-अर्चना की गई। धार्मिक मान्यता है कि मां बाराही के इस पवित्र स्थल पर विराजमान होने के साथ ही यहां जलधारा फूटी थी। तब से यह नौला श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
स्थानीय लोगों के अनुसार भीषण गर्मी में भी इसका जलस्रोत सूखता नहीं है। पानी में मिठास और औषधीय गुण होने की भी मान्यता है। श्रद्धालु इसे मां बाराही का प्रसाद मानकर ग्रहण करते हैं।
धाम में इस अवसर पर विशेष प्रसाद तैयार किया गया। देवी-देवताओं को भोग लगाने के बाद चार खाम और सात थोक के लोगों ने प्रसाद और पंचगव्य अपने घर ले जाकर उसका छिड़काव किया। मान्यता है कि इससे घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
पारंपरिक अनुष्ठान आचार्य कीर्ति शास्त्री के पुरोहितत्व में चार खाम-सात थोक के लोगों और फुलारा खाम के देवी सेवक खुशहाल सिंह की मौजूदगी में संपन्न हुआ।
एक साल के लिए बदली पूजा की जिम्मेदारी_
बाराही धाम की परंपरा के अनुसार इसी दिन मंदिर के पुजारी की अदला-बदली भी की गई। अब तक गुरना गांव के महेश पुजारी मां बाराही की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। आगामी एक वर्ष तक टकना गांव के हरिदत्त पुजारी धाम में पूजा-अर्चना करेंगे।
मेले में बढ़ी रौनक, कढ़ाइयां बनीं आकर्षण_
उधर, बाराही धाम का व्यापारिक मेला भी अब पूरे यौवन पर पहुंचने लगा है। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग खरीदारी के लिए देवीधुरा पहुंच रहे हैं। स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक वस्तुओं की मांग भी बनी हुई है।
धुनाघाट निवासी कैलाश राम की हाथ से तैयार की गई लोहे की कढ़ाइयां मेले में लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हैं। पारंपरिक तरीके से तैयार इन कढ़ाइयों को काली कुमाऊं की खास सौगात माना जाता है। मेले में पहुंच रहे लोग इन्हें खरीदने में खास दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
बाराही धाम में एक ओर धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए सदियों पुरानी परंपराएं जीवंत हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक मेले की बढ़ती भीड़ पहाड़ की लोक संस्कृति और स्थानीय उत्पादों की रौनक को भी सामने ला रही है।





