चंपावत। किसी भी अस्पताल की पहचान केवल उसकी आधुनिक मशीनों से नहीं, बल्कि उन मशीनों के सुचारु संचालन और मरीजों को मिलने वाली समयबद्ध स्वास्थ्य सेवाओं से होती है। चम्पावत जिला चिकित्सालय में शनिवार को सामने आई घटना एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर उजागर करती है।
बाराकोट से एमआरआई जांच कराने पहुंचे एक मरीज को अस्पताल द्वारा 18 जुलाई की तिथि दी गई थी। निर्धारित समय पर पहुंचने के बावजूद तकनीशियन के उपलब्ध न होने के कारण जांच नहीं हो सकी। दूरदराज से लंबी यात्रा कर आए मरीज के लिए यह केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि समय, धन और मानसिक पीड़ा का विषय था। आक्रोशित मरीज ने अस्पताल प्रशासन के सामने ही अपना पर्चा फाड़ते हुए कहा कि वह दोबारा इस अस्पताल में उपचार के लिए नहीं आएगा। यह प्रतिक्रिया किसी एक व्यक्ति की नाराजगी नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति जनता के घटते विश्वास का संकेत है।
चिंताजनक पहलू यह भी रहा कि समस्या के समाधान पर ध्यान देने के बजाय अस्पताल प्रशासन और कुछ चिकित्सकों का ध्यान मीडिया कर्मियों से उलझने तथा पुलिस में शिकायत की बात करने पर अधिक दिखाई दिया। यदि व्यवस्था में कमी है तो उसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम उठाना ही प्रशासनिक परिपक्वता का परिचायक होगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आधुनिक मशीनों और संसाधनों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। लेकिन यदि एमआरआई जैसी अत्याधुनिक मशीन तकनीशियन के अभाव में बंद पड़ी रहे, तो यह केवल संसाधनों की बर्बादी नहीं बल्कि सरकार की मंशा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
अब आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की है। जिला अस्पताल में पर्याप्त तकनीकी स्टाफ, प्रभावी प्रबंधन और मरीज-केंद्रित कार्यसंस्कृति विकसित किए बिना स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव नहीं है। आखिर मरीज अस्पताल इलाज की उम्मीद लेकर आता है, निराश होकर लौटने के लिए नहीं।
चंपावत: मशीनें हैं, लेकिन व्यवस्था नहीं; आखिर कब बदलेगी जिला अस्पताल की तस्वीर?
