

74 वर्षीय गंभीर मरीज की रातभर चली अग्निपरीक्षा, स्टेपनी पंचर और जैक खराब; गैस वाहन चालक के भरोसे बदला टायर, सुबह चार बजे पहुंचे टनकपुर।
चंपावत। पहाड़ में गंभीर मरीज को अस्पताल पहुंचाना पहले ही चुनौती है, लेकिन जब जिंदगी बचाने निकली सरकारी एंबुलेंस ही बीच रास्ते जवाब दे जाए तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। चंपावत के केशव दत्त पंत (74) को बेहतर उपचार के लिए ले जा रही 108 एंबुलेंस बेलखेत के पास आधी रात पंचर हो गई। स्टेपनी भी पंचर निकली और टायर बदलने के लिए जैक तक काम नहीं कर रहा था। ऐसे में मरीज को अस्पताल पहुंचाने के बजाय परिजन घंटों सड़क पर मदद तलाशते रहे।
परिजनों के मुताबिक, केशव दत्त पंत की दिमाग की नस फटने के बाद उन्हें बेहतर उपचार की जरूरत थी। रात करीब नौ बजे उन्हें अस्पताल लाया गया और रात 11 बजे रेफर करने का निर्णय हुआ। हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल रेफर किए जाने की बात सामने आई, लेकिन परिजन अंततः उन्हें बरेली के राममूर्ति अस्पताल ले गए। चंपावत में एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने पर तामली से 108 बुलाई गई। मगर बेलखेत पहुंचते ही एंबुलेंस का टायर पंचर हो गया।
रात के अंधेरे में गंभीर मरीज के साथ फंसे परिजन मदद के लिए वाहनों को रोकते रहे। करीब एक घंटे तक कोई सहायता नहीं मिली। आखिरकार टनकपुर जा रहे गैस के एक बड़े वाहन के चालक ने अपना जैक देकर मदद की। लेकिन एंबुलेंस की स्टेपनी भी पंचर निकली। जिस वाहन से मरीज को जल्द अस्पताल पहुंचना था, वह खुद सड़क पर खड़ा होकर दूसरी एंबुलेंस का इंतजार करने लगा। इसके बाद सुखीढांग से दूसरी एंबुलेंस बुलानी पड़ी। परिजनों के अनुसार, पूरी रात की मशक्कत के बाद वे सुबह करीब चार बजे टनकपुर पहुंचे। वहां से निजी एंबुलेंस की व्यवस्था कर केशव दत्त पंत को बरेली के राममूर्ति अस्पताल ले जाना पड़ा।
इस घटना ने 108 एंबुलेंस सेवा की तकनीकी तैयारियों और आपातकालीन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या गंभीर मरीज को लेकर निकलने से पहले एंबुलेंस के टायर, स्टेपनी और जरूरी उपकरणों की जांच नहीं होनी चाहिए? रास्ते में वाहन खराब होने पर दूसरी एंबुलेंस उपलब्ध कराने की व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों रही? अगर गैस वाहन का चालक मदद के लिए नहीं रुकता, तो मरीज को अस्पताल पहुंचाने में और कितनी देर होती?
जिला चिकित्सालय के सीएमएस डॉ. एचएस यांकी ने कहा कि मामला उनके कार्यक्षेत्र से संबंधित नहीं है। उन्होंने बताया कि 108 एंबुलेंस सेवा की अलग टीम होती है, जो ऐसी परिस्थितियों में समन्वय कर मरीज को परेशानी से बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाती है।
लेकिन बेलखेत की घटना में सवाल यही है कि जब एंबुलेंस बीच रास्ते जवाब दे गई, तब मरीज को समय पर दूसरी एंबुलेंस उपलब्ध कराने का समन्वय कहां था? पहाड़ में अस्पतालों की दूरी और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच आपातकालीन वाहन की तकनीकी खराबी मरीज की मुश्किल कई गुना बढ़ा सकती है।
मरीज को अस्पताल पहुंचाना एंबुलेंस की जिम्मेदारी है, आधी रात सड़क पर इंतजाम जुटाना परिजनों की नहीं। अब देखना यह है कि संबंधित विभाग इस घटना का संज्ञान लेकर एंबुलेंस की तकनीकी जांच और आपात स्थिति में वैकल्पिक वाहन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है।

फोटो_रात्रि में एंबुलेंस का टायर ठीक करता चालक।



