चंपावत: बहनों के नाम पर उत्सव, बच्चों के हिस्से इंतजार और मंच से 2027 का संदेश।

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चंपावत। मंच पर महिला सशक्तीकरण के बड़े-बड़े दावे थे, आत्मनिर्भर बहनों के सम्मान की बातें थीं और सरकार की उपलब्धियों का बखान था। लेकिन मंच के नीचे की तस्वीर कुछ और ही सवाल खड़े कर रही थी। मुख्यमंत्री के इंतजार में छोटे स्कूली बच्चे लंबे समय तक बैठे रहे, पत्रकार खड़े होकर कवरेज करते रहे और इसी बीच मंच से 2027 के चुनावी संदेश भी गूंजते रहे।
‘मुख्यमंत्री सशक्त बहना उत्सव’ में खराब मौसम के कारण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पहुंचने में देरी हुई। देरी मौसम की मजबूरी हो सकती है, लेकिन सवाल व्यवस्था पर है—क्या बच्चों के भूखे-प्यासे इंतजार का भी कोई जवाब है?

इतने बड़े सरकारी आयोजन में समय बिगड़ने की स्थिति में आखिर प्लान-बी कहां था? मुख्यमंत्री के आने में देरी हो सकती है, लेकिन बच्चों के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? महिला सशक्तीकरण के उत्सव में व्यवस्था की यह तस्वीर कई सवाल छोड़ गई।

वीआईपी के लिए कुर्सियां, पत्रकारों के लिए इंतजार_

मंच और वीआईपी व्यवस्था चाक-चौबंद नजर आई, लेकिन खबर पहुंचाने वाले पत्रकारों के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था नहीं रही। कई पत्रकारों को लंबे समय तक खड़े होकर कवरेज करनी पड़ी।
कुर्सियां मंच के करीब थीं, लेकिन खबर लिखने वालों के लिए जगह कम पड़ गई।

महिला सशक्तीकरण के मंच से महिला नेता दूर_

भाजपा महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष दीपा जोशी का मंच पर नहीं जाना भी चर्चाओं में रहा। उन्हें मंच पर लाने के लिए मान-मनौव्वल की बात सामने आई, लेकिन वह मंच पर नहीं गईं और नाराज नजर आईं।
कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन सवाल सीधा है—महिला सशक्तीकरण के सबसे बड़े मंच पर महिला संगठन की जिलाध्यक्ष आखिर अलग-थलग क्यों नजर आईं?

मंच बहनों का, निशाना 2027_

उत्सव का नाम महिला सशक्तीकरण का था, लेकिन मंच से राजनीतिक संदेश भी पूरी ताकत से दिए गए। सरकार की उपलब्धियां गिनाई गईं, विपक्ष पर निशाना साधा गया और 2027 विधानसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन भी तैयार होती दिखाई दी।

यानी बहनों के नाम पर उत्सव, बच्चों के हिस्से इंतजार और मंच से चुनावी संदेश। महिलाओं के हुनर को मंच देना जरूरी है, उन्हें बाजार और सम्मान देना भी जरूरी है। लेकिन जब उसी आयोजन में बच्चे भूखे-प्यासे इंतजार करें, पत्रकार खड़े रहकर काम करें और राजनीतिक संदेश ज्यादा गूंजने लगें, तो सवाल उठना लाजिमी है।

“सशक्त बहना उत्सव में आखिर मजबूत कौन हुआ—महिला सशक्तीकरण या 2027 का चुनावी मंच?”

फोटो_ उत्सव के दौरान मुख्यमंत्री का जोर-शोर से स्वागत करते भाजपा कार्यकर्ता।


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