

लोहाघाट डिपो की बदहाली पर कर्मचारियों में आक्रोश, 20 साल से संविदा-विशेष श्रेणी में काम कर रहे कर्मचारियों को अब भी स्थायी भविष्य का इंतजार।
लोहाघाट। पहाड़ की लाइफलाइन कही जाने वाली रोडवेज व्यवस्था लोहाघाट में खुद सहारे की मोहताज नजर आ रही है। डिपो में बसों की संख्या लगातार घट रही है, जरूरी टायर और स्पेयर पार्ट्स तक उपलब्ध नहीं हैं और वर्षों से सेवाएं दे रहे संविदा व विशेष श्रेणी के कर्मचारी आज भी अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। कर्मचारियों का सवाल सीधा है—जब हमारी सुनने वाला कोई नहीं, तो हम अपना दर्द किसके सामने रखें?
कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से उन्हें शिकायत नहीं है, लेकिन लोहाघाट डिपो की हकीकत मुख्यमंत्री तक पहुंचाने वाला कोई नहीं है। जिले में जनप्रतिनिधियों और दर्जा राज्य मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद रोडवेज की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। कर्मचारियों का कहना है कि नेताओं को जनता तक पहुंचाने वाली यही बसें आज खुद व्यवस्था की अनदेखी का शिकार हैं।
डिपो में बसों की संख्या आधी से भी कम होने का दावा किया जा रहा है। जो बसें चल रही हैं, उनकी हालत भी कर्मचारियों के अनुसार चिंताजनक है। बस रास्ते में कब जवाब दे जाए, इसका भरोसा नहीं। टायर और जरूरी स्पेयर पार्ट्स की कमी से व्यवस्था और मुश्किल हो रही है। इसका सीधा असर यात्रियों पर पड़ रहा है।
संविदा और विशेष श्रेणी के कर्मचारी वर्षों से नियमितीकरण की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कई कर्मचारी 20-20 साल से सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन आज भी उनकी नौकरी का भविष्य अनिश्चित है। कर्मचारियों का कहना है कि पूरे महीने काम करने के बाद भी कई लोगों को 15 हजार रुपये तक नहीं मिल पाते। इसके बावजूद वे रोडवेज की सेवा में जुटे हैं।
गजेंद्र द्विवेदी, महिपाल सिंह, जाकिर अली, कौस्तुभ ओली और किशन सिंह आदि कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अपना जीवन रोडवेज को दे दिया, लेकिन बदले में उन्हें आज भी स्थायित्व की गारंटी नहीं मिली।
कर्मचारियों ने वर्कशॉप और स्टेशन की बदहाली का मुद्दा भी उठाया है। उनका कहना है कि समस्याएं बार-बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने रखी गईं, लेकिन समाधान के बजाय इंतजार ही हाथ आया।
रोडवेज एम्पलाइज यूनियन के डिपो अध्यक्ष तरुण रावल ने कहा कि कर्मचारियों के पास अब आंदोलन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। 11 अक्टूबर को टनकपुर में पिथौरागढ़, लोहाघाट और टनकपुर डिपो के कर्मचारियों की संयुक्त बैठक होगी। इसमें आगामी संघर्ष की रणनीति तय की जाएगी।
अब सवाल यह है कि सरकार और रोडवेज प्रबंधन कर्मचारियों की आवाज आंदोलन में बदलने का इंतजार करेगा या उससे पहले लोहाघाट डिपो की बदहाली और कर्मचारियों की समस्याओं पर कोई ठोस कदम उठाएगा?
फोटो_ मांगों को लेकर संघर्ष की राह पर रोडवेज कर्मचारी।




