हरेला पर्व- पहाड़ की हरियाली, लोकसंस्कृति और प्रकृति संरक्षण का अटूट संकल्प।

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चंपावत।  उत्तराखंड की पहचान केवल बर्फ से ढकी हिमालयी चोटियों, कल-कल बहती नदियों और मनमोहक वादियों से नहीं, बल्कि उसकी जीवंत लोकसंस्कृति से भी है। यहां के लोकपर्व प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व की उस परंपरा के प्रतीक हैं, जिसने सदियों से पहाड़ के जीवन को संवारने का काम किया है। इन्हीं लोकपर्वों में हरेला सबसे महत्वपूर्ण है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हरियाली, कृषि, पर्यावरण और जीवन के प्रति कृतज्ञता का लोकसंकल्प है।
सावन के आगमन के साथ जब पहाड़ हरियाली की चादर ओढ़ लेते हैं, तब घर-घर में बोया गया हरेला भी नई उम्मीदों के साथ अंकुरित होता है। सात प्रकार के अनाजों से उगने वाले ये हरे अंकुर केवल अच्छी फसल की कामना नहीं, बल्कि इस विश्वास के प्रतीक हैं कि प्रकृति समृद्ध होगी तो जीवन भी खुशहाल रहेगा। यही सोच उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी ताकत रही है।
आज समय बदल चुका है। उत्तराखंड के पहाड़ पलायन, सूखते जलस्रोतों, जंगलों में बढ़ती आग, अनियोजित विकास और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जिन जंगलों ने सदियों तक नदियों को जीवन दिया, वही जंगल आज संकट में हैं। ऐसे दौर में हरेला केवल परंपरा निभाने का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने का जनआंदोलन बनने की आवश्यकता है।
बीते कुछ वर्षों से हरेला के अवसर पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जा रहा है। यह स्वागतयोग्य पहल है, लेकिन इसकी सफलता तभी होगी जब पौधों को पेड़ बनने तक संरक्षण मिले। केवल पौधे लगाकर तस्वीरें खिंचवाना हरेला की भावना नहीं है।

हरेला का वास्तविक संदेश है- धरती को हरा-भरा रखना और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति की धरोहर सुरक्षित छोड़ना। आधुनिक जीवनशैली के बीच नई पीढ़ी अपनी लोकपरंपराओं से दूर होती जा रही है। ऐसे में परिवार, विद्यालय और समाज का दायित्व है कि वे बच्चों को हरेला के सांस्कृतिक, कृषि और पर्यावरणीय महत्व से परिचित कराएं। क्योंकि लोकपर्व केवल त्योहार नहीं होते, वे समाज की पहचान और उसकी जड़ों को जीवित रखते हैं।
हरेला पर बहनों द्वारा भाइयों को दिया जाने वाला यह लोक आशीर्वाद केवल पारिवारिक स्नेह नहीं, बल्कि समूचे समाज और प्रकृति की खुशहाली की कामना है—
“लाग हरर्याव, लाग दशै, लाग बग्वाव।
जी रया, जागी रया, य दिन, य महैंण नित-नित भ्यटनै रया।
बेर जस फल जया, दूब जस पंगूर जया,
श्याव जसि बुद्धि है जो, स्यूं जस तराण ऐ जौ।”

हरेला का संदेश आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। यदि पहाड़ हरे रहेंगे तो जलस्रोत जीवित रहेंगे, जंगल सुरक्षित रहेंगे, खेती समृद्ध होगी और उत्तराखंड की लोकसंस्कृति भी आने वाली पीढ़ियों तक अक्षुण्ण बनी रहेगी। इसलिए हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पहाड़, प्रकृति और भविष्य को बचाने का अटूट संकल्प है।


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