

मायावती के जंगल में बाघ की गर्जना और किंग कोबरा की मौजूदगी ने बढ़ाई चिंता, उजड़ते प्राकृतिक आवास पर उठे सवाल।
मायावती/चंपावत। मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष के बीच अद्वैत आश्रम मायावती के घने जंगल सह-अस्तित्व की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। आश्रम के प्रेसिडेंट स्वामी शुद्धिदानंद महाराज का कहना है कि प्रकृति ने मनुष्य की तरह वन्यजीवों को भी जीने का समान अधिकार दिया है।
जब तक मनुष्य प्रकृति के प्रति संवेदनशील नहीं होगा और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक संघर्ष की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल है।
मायावती के जंगलों के बीच स्थित अद्वैत आश्रम में धर्मार्थ चिकित्सालय होने के कारण लोगों की आवाजाही बनी रहती है। इसके बावजूद यहां वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व का अनुभव देखने को मिलता है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में जंगल सिकुड़ रहे हैं और मानवीय हस्तक्षेप बढ़ रहा है, वहां मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं।
मायावती के जंगलों में पिछले दो वर्षों से बंगाल टाइगर की गर्जना सुनाई देने की बात सामने आ रही है। पिछले वर्ष एक बाघ की मौत भी हुई थी, लेकिन उसकी मौत के कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है। क्षेत्र में किंग कोबरा जैसे विषैले सांपों की मौजूदगी की बात भी सामने आई है। इन परिस्थितियों ने वन्यजीवों के आवास और बदलते पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ाई है।
जंगलों से घिरे दूरस्थ तोकों में रहने वाले परिवारों के लिए भी वन्यजीवों की आवाजाही खतरा बन सकती है। कई स्थानों पर बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, जिससे ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से फैल रही लैंटाना घास कृषि और बागवानी को प्रभावित कर रही है। इसके घने झाड़ीनुमा फैलाव से वन्यजीवों को छिपने के स्थान भी मिल सकते हैं। वन विभाग की ओर से इसकी सफाई के प्रयास किए जाते हैं, लेकिन इसके दोबारा फैलाव को रोकने के लिए प्रभावी और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है।
ड्रोन और कैमरों से निगरानी, लेकिन जंगल बचाना जरूरी
वन विभाग मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए ड्रोन, ट्रैप कैमरे और अन्य आधुनिक संसाधनों का उपयोग कर रहा है। वन्यजीवों के हमलों में जनहानि होने पर राहत राशि भी दी जाती है। इसके बावजूद सवाल है कि जब जंगल लगातार सिकुड़ेंगे, तो वन्यजीव अपना आशियाना कहां बनाएंगे?
प्राकृतिक आवासों की बहाली और ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। जंगलों की अनदेखी का असर वन्यजीवों के साथ-साथ खेती, बागवानी और पेयजल स्रोतों पर भी पड़ रहा है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना मानव-वन्यजीव संघर्ष का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
फोटो_ अद्वैत आश्रम मायावती का घना जंगल, जहां प्राकृतिक वातावरण में बेखौफ घूमते वन्यजीव।




